कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय एक बड़े वित्तीय संकट और आंतरिक कलह से जूझ रही है। बिधाननगर पुलिस ने पार्टी के तीन प्रमुख बैंक खातों को ‘डेबिट फ्रीज’ कर दिया है, जिनमें करीब ₹440 करोड़ की भारी-भरकम राशि जमा है। इस कार्रवाई के बाद से राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
क्या है पूरा विवाद?
यह मामला पार्टी के भीतर चल रहे वर्चस्व की लड़ाई से जुड़ा है। हाल ही में पार्टी के पूर्व कोषाध्यक्ष अरूप विश्वास ने बैंक को एक पत्र लिखकर खातों के लेनदेन पर रोक लगाने का अनुरोध किया था। इसके तुरंत बाद, विपक्ष के नेता रिताब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 10 बागी विधायकों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि इन खातों में जमा धन का स्रोत संदिग्ध है और इसमें ‘कट-मनी’ और सार्वजनिक धन के दुरुपयोग जैसी धांधली हो सकती है।
पार्टी का क्या कहना है?
TMC के वर्तमान नेतृत्व ने इस पूरी कार्रवाई को साजिश करार दिया है। पार्टी नेता कुणाल घोष का कहना है कि अरूप विश्वास को 5 जून, 2026 को ही कोषाध्यक्ष पद से हटा दिया गया था, इसलिए उनके द्वारा बैंक को निर्देश देना पूरी तरह से अवैध है। पार्टी ने अरूप विश्वास को ‘शो-कॉज’ नोटिस जारी किया है और उनसे जवाब मांगा है।
कानूनी लड़ाई की तैयारी
TMC अब इस मामले को कलकत्ता हाईकोर्ट ले जाने की तैयारी कर रही है। पार्टी का स्पष्ट तर्क है कि बिना किसी अदालती आदेश के पुलिस द्वारा इस तरह से खातों पर रोक लगाना पूरी तरह से असंवैधानिक है।
फिलहाल, बिधाननगर पुलिस कमिश्नरेट का साइबर सेल मामले की गहराई से जांच कर रहा है, जिससे आने वाले दिनों में और भी खुलासे होने की उम्मीद है।
इस मामले में कानूनी दृष्टिकोण से स्थिति काफी महत्वपूर्ण है। भारतीय कानून और हाल के अदालती फैसलों के अनुसार, पुलिस द्वारा बैंक खातों को फ्रीज करने की प्रक्रिया से संबंधित कुछ प्रमुख कानूनी पहलू निम्नलिखित हैं:
1. कानूनी अधिकार और प्रक्रियाएँ: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और CrPC: बैंक खातों को फ्रीज करने की शक्ति पहले दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 102 के तहत दी गई थी, जो अब नई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 106 और 107 के अंतर्गत आती है।
न्यायिक निरीक्षण (Judicial Oversight): कानून के अनुसार, पुलिस किसी भी खाते को अनिश्चितकाल के लिए फ्रीज नहीं रख सकती। पुलिस को बैंक खातों की जब्ती की रिपोर्ट ‘तत्काल’ (forthwith) संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट को देना अनिवार्य है। बिना मजिस्ट्रेट को सूचित किए खातों को फ्रीज रखना कानून की नजर में अवैध माना जा सकता है।
2. कलकत्ता हाईकोर्ट का रुख: इस मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट के हालिया फैसलों ने स्पष्ट किया है कि बिना आदेश के कार्रवाई नहीं की जा सकती: हाईकोर्ट ने कई मामलों में माना है कि केवल पुलिस या किसी पोर्टल (जैसे MHA साइबर क्राइम पोर्टल) की शिकायत पर बैंक खाता फ्रीज करना पर्याप्त नहीं है।