मार्च में पेश किए गए विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 ने देश की राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस नए विधेयक के प्रावधानों के तहत, सरकार द्वारा नियुक्त एक प्राधिकरण को यह विशेष अधिकार दिया गया है कि यदि किसी गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) का पंजीकरण समाप्त हो जाता है, तो वह उस एनजीओ द्वारा विदेशी चंदे के माध्यम से निर्मित संपत्तियों, जैसे कि स्कूल और अस्पतालों का नियंत्रण सीधे अपने हाथ में ले सके। इस अहम विधाई कदम को लेकर इसके समर्थकों और आलोचकों के बीच तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
समर्थकों और सरकार का दृष्टिकोण
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और सरकार इस विधेयक को देश के सामरिक और आंतरिक हितों के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानती है। उनके प्रमुख तर्क इस प्रकार हैं:
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राष्ट्रीय सुरक्षा: सरकार का दृढ़ मत है कि यह कानून देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
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पारदर्शिता और निगरानी: इसके माध्यम से देश में आने वाली विदेशी फंडिंग पर पैनी नजर रखी जा सकेगी।
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दुरुपयोग पर लगाम: इस संशोधन से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि मिलने वाले धन का दुरुपयोग धर्मांतरण या किसी भी प्रकार की राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में न हो पाए।
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वैश्विक तर्ज: समर्थकों द्वारा इस विधेयक की तुलना अमेरिका के ‘फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट’ (FARA) जैसे कड़े और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त कानूनों के समकक्ष की जा रही है।
आलोचकों, एनजीओ और विपक्षी दलों का पक्ष
दूसरी ओर, एनजीओ समूहों और विपक्षी दलों ने इस संशोधन पर गंभीर चिंताएं जाहिर की हैं। उनके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
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अदालती निगरानी का अभाव: आलोचकों का तर्क है कि इससे बिना किसी अदालती निगरानी के वैध संपत्तियों के जब्तीकरण का बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा।
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अतिरिक्त बोझ: इस कानून से विशेष रूप से जमीनी स्तर पर काम करने वाले छोटे एनजीओ पर अनावश्यक कानूनी और प्रशासनिक बोझ बढ़ेगा।
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स्वतंत्रता पर असर: विपक्ष और नागरिक संगठनों का मानना है कि यह कदम देश में स्वतंत्र नागरिक समाज की आवाज और उसकी कार्यप्रणाली को कमजोर कर सकता है।