झारखंड की राजनीति में भारी झटका लगा है, क्योंकि राज्य के वरिष्ठ नेता और झारखंड आंदोलन के प्रणेता, शिबू सोरेन का निधन हो गया है। दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में उनका अंतिम साँस लेना हुआ, जहाँ वे पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे और उनका उपचार चल रहा था। शिबू सोरेन, जिन्हें पूरे झारखंड में ‘दिशोम गुरु’ के नाम से भी जाना जाता था, आदिवासी समाज की आवाज रहे हैं। उनके निधन की खबर सुनते ही पूरे राज्य में शोक की लहर फैल गई है। लोगों में एक गहरा दुख और श्रद्धांजलि की भावना दिखाई दे रही है। राजनीतिक और सामाजिक संगठनों में मातम पसरा हुआ है, क्योंकि उनका जीवन और कार्य झारखंड के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। शिबू सोरेन न सिर्फ झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक नेताओं में शामिल थे, बल्कि उन्होंने केंद्र सरकार में भी मंत्री पद संभाला था। उनका जीवन पूरी तरह से आदिवासी समाज के अधिकारों, सामाजिक न्याय और झारखंड की विशेष पहचान के लिए संघर्ष में समर्पित रहा। उन्होंने झारखंड की सामाजिक और राजनीतिक चेतना को जागरूक करने में अहम भूमिका निभाई। उनके जाने को झारखंड की राजनीति के एक युग का अंत माना जा रहा है। उनके योगदान और उनके द्वारा स्थापित आदर्श आज भी लोगों के बीच जीवित हैं, और उनके निधन से जिला-प्रदेश में शोक की लहर दौड़ गई है।
शिबू सोरेन (जन्म 11 जनवरी, 1944) एक प्रसिद्ध भारतीय राजनेता हैं। वह झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष हैं। 2004 में, मनमोहन सिंह की सरकार में उन्हें कोयला मंत्री नियुक्त किया गया था, लेकिन चिरूडीह कांड—जिसमें 11 लोगों की हत्या हुई थी—के आरोप में गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बाद, उन्हें 24 जुलाई 2004 को केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा। वे झारखंड के दुमका लोकसभा सीट से छठी बार सांसद चुने गए हैं।
शिबू का जन्म बिहार के हजारीबाग जिले के नामरा गाँव में हुआ था। उन्हीं की विद्यालयीन शिक्षा भी यहीं प्राप्त हुई। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद, उनका विवाह हो गया, और उन्होंने पिता की खेती में मदद करने का निर्णय लिया। उनके पिता, शोभराम सोरेन, की हत्या हो चुकी थी। उनके राजनीतिक जीवन की शुरूआत 1970 में हुई। 23 जनवरी, 1975 को, उन्होंने जामताड़ा जिले के चिरूडीह गाँव में “बाहरी” यानी आदिवासी जिन्हें “दिकू” कहा जाता है, को खदेड़ने के लिए एक हिंसक भीड़ का नेतृत्व किया था। इस घटना में 11 लोग मारे गए थे। उन्हें 68 अन्य व्यक्तियों के साथ हत्या के आरोप में अभियुक्त बनाकर जेल भेजा गया।
शिबू पहली बार 1977 में लोकसभा चुनाव में खड़े हुए, परंतु हार गए। 1980 में वह चुनाव जीतकर सांसद बने। उसके बाद वे लगातार 1986, 1989, 1991, और 1996 में भी चुनाव जीते। 10 अप्रैल, 2002 को वह राज्यसभा के सदस्य चुने गए, और 2 जून 2002 तक इसका कार्यकाल निभाया। 2004 में वे दुमका से लोकसभा के लिए चुने गए।
वर्ष 2005 के झारखंड विधानसभा चुनावों के बाद, वे विवादास्पद तरीके से झारखंड के मुख्यमंत्री बने, लेकिन बहुमत न साबित करने के कारण कुछ ही दिनों बाद अपना पद छोड़ना पड़ा।